3 डीआरएस तकनीकें तुलना: सही फैसला कैसे बनता है
क्रिकेट में डीआरएस केवल अंपायर का फैसला बदलने वाला बटन नहीं, बल्कि 15 सेकंड के भीतर शुरू होने वाली तकनीकी जांच प्रक्रिया है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी आईसीसी के मुकाबलों में बल्लेबाजी टीम या क्...
3 डीआरएस तकनीकें तुलना: सही फैसला कैसे बनता है
क्रिकेट में डीआरएस केवल अंपायर का फैसला बदलने वाला बटन नहीं, बल्कि 15 सेकंड के भीतर शुरू होने वाली तकनीकी जांच प्रक्रिया है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी आईसीसी के मुकाबलों में बल्लेबाजी टीम या क्षेत्ररक्षण कप्तान मैदानी निर्णय को चुनौती दे सकता है, जबकि तीसरा अंपायर हॉक-आई बॉल ट्रैकिंग, अल्ट्राएज और उपलब्ध होने पर हॉट स्पॉट जैसे प्रमाणों की समीक्षा करता है। भारत, पाकिस्तान, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया सहित अंतरराष्ट्रीय टीमों में इसका उपयोग प्रारूप के अनुसार बदलता है; टेस्ट और एकदिवसीय क्रिकेट में सामान्यतः दो असफल रिव्यू, जबकि टी20 अंतरराष्ट्रीय में एक असफल रिव्यू मिलता है। एल्बीडब्ल्यू निर्णय में गेंद का पिचिंग, प्रभाव और विकेट परिणाम देखे जाते हैं, लेकिन अंपायर्स कॉल मूल फैसला कायम रख सकती है। इसलिए रिव्यू लेने से पहले संकेतों को तेजी से पढ़ना और नियम समझना सबसे व्यावहारिक रणनीति है।

गलत धारणा यह है कि तकनीक हर बार बिल्कुल निश्चित उत्तर देती है। वास्तव में डीआरएस उपलब्ध प्रमाण, कैमरा कोण, ध्वनि संकेत और नियमों की सीमाओं को जोड़कर सबसे विश्वसनीय फैसला बनाता है। आईसीसी के आधिकारिक नियम और मैरीलेबोन क्रिकेट क्लब के नियम इस प्रक्रिया की बुनियादी रूपरेखा देते हैं, जबकि प्रसारण में दिखने वाला ग्राफिक केवल निर्णय का दृश्य रूप है। आईपीएल समाचार पर इस विषय को समझने का लाभ यह है कि आप केवल “आउट” या “नॉट आउट” नहीं देखते, बल्कि यह भी समझते हैं कि फैसला किस प्रमाण पर टिका है।
डीआरएस को समझने के लिए तीन आंकड़े याद रखें: 15 सेकंड का अनुरोध समय, एल्बीडब्ल्यू के तीन परीक्षण और प्रारूप के अनुसार सीमित रिव्यू। यही गणित है; भावना बाद में आती है, मानो या न मानो—मैं ऐसा ही मानता हूं।
डीआरएस की तकनीक और निर्णय-प्रवाह को दृश्य रूप में समझना चाहते हैं? नीचे दिए गए संसाधन से आगे पढ़ें।
अगर बल्लेबाज को आउट दिया जाए: रिव्यू कैसे लें?
आउट दिए गए बल्लेबाज की टीम को 15 सेकंड के भीतर दोनों हाथों से अंग्रेजी अक्षर “टी” जैसा संकेत देकर रिव्यू मांगना होता है। कप्तान या मैदान पर मौजूद बल्लेबाज संकेत दे सकता है, लेकिन अंतिम पुष्टि मैदानी अंपायर करता है। इसके बाद तीसरा अंपायर पहले जांचता है कि रिव्यू समय पर मांगा गया था और निर्णय समीक्षा योग्य था या नहीं।
रिव्यू प्रक्रिया को तीन चरणों में बांटना आसान है:
- मैदानी अंपायर का मूल निर्णय दर्ज किया जाता है।
- तीसरा अंपायर उपलब्ध वीडियो, ध्वनि और गेंद-प्रक्षेपण प्रमाण देखता है।
- पर्याप्त प्रमाण मिलने पर निर्णय बदला जाता है; अन्यथा मूल फैसला बरकरार रहता है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात छूट जाती है: रिव्यू अपने-आप “गलती खोजो” प्रक्रिया नहीं है। तीसरा अंपायर घटना से जुड़ी समीक्षा योग्य बातों की जांच करता है, जैसे गेंद का बल्ले से संपर्क, कैच का जमीन छूना या एल्बीडब्ल्यू में गेंद का रास्ता। अल्ट्राएज पर हल्की आवाज दिखे तो भी यह देखना जरूरी है कि आवाज गेंद के बल्ले या पैड के पास पहुंचने के ठीक समय आई थी या नहीं। इसलिए केवल तेज उछाल वाली रेखा देखकर निर्णय निकालना कमजोर विश्लेषण है।
क्रिकेट दक्षिण अफ्रीका, भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे बोर्ड अपने घरेलू मुकाबलों में अलग उत्पादन व्यवस्था इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मैचों में आईसीसी की खेल शर्तें प्राथमिक आधार रहती हैं। क्रिकेट में एल्बीडब्ल्यू नियमों की सरल गाइड पढ़ने से पिचिंग, प्रभाव और विकेट की भूमिका और स्पष्ट होगी।

यदि आप रिव्यू संकेत और समयसीमा को जल्दी पहचानना चाहते हैं, तो इस संक्षिप्त मार्गदर्शन को देखें।
अगर बल्लेबाज नॉट आउट हो: क्षेत्ररक्षण टीम क्या करे?
जब मैदानी अंपायर आउट नहीं देता, तब क्षेत्ररक्षण कप्तान 15 सेकंड की सीमा में रिव्यू मांग सकता है। इस स्थिति में कप्तान को अपील के संकेतों, गेंद की दिशा, बल्ले के संभावित किनारे और एल्बीडब्ल्यू की ज्यामिति को जल्दी जोड़ना पड़ता है। विकेटकीपर की आवाज उपयोगी हो सकती है, लेकिन वह निर्णायक प्रमाण नहीं है; कप्तान को उपलब्ध कोण और मैच की परिस्थिति देखकर फैसला लेना चाहिए।
रिव्यू सफल हो तो संबंधित असफल रिव्यू सामान्यतः वापस नहीं कटता, क्योंकि टीम ने सही चुनौती दी। अंपायर्स कॉल में भी रिव्यू बचा रहता है, क्योंकि बॉल ट्रैकिंग ने परिणाम को निर्णायक सीमा से बाहर नहीं निकाला। इसके उलट, जब तकनीकी जांच मूल निर्णय को गलत साबित नहीं करती, तो असफल रिव्यू कम हो जाता है। यही कारण है कि 78 रन की साझेदारी के बीच एक जल्दबाजी वाला रिव्यू अंतिम ओवरों में रणनीतिक नुकसान बन सकता है।
क्षेत्ररक्षण कप्तान को इन संकेतों पर ध्यान देना चाहिए:
- गेंद बल्ले के किनारे के बेहद पास से गुजरी हो।
- गेंद पैड पर लगी हो और विकेट की सीध में आने की संभावना हो।
- कैच लेते समय उंगलियों और जमीन के बीच स्पष्ट जगह दिखे।
- मैदानी अंपायर का निर्णय प्रसारण कोणों से तुरंत संदिग्ध लगे।
- गेंद नो-बॉल हो सकती हो, खासकर ऊंचे कैच या स्टंपिंग में।
यहां सूचना-लाभ वाला नियम है: कैच की समीक्षा में डीआरएस केवल बल्ले का किनारा नहीं देखता; तीसरा अंपायर कैच की वैधता, गेंद पर नियंत्रण और जमीन से संपर्क भी देख सकता है। इसलिए “अल्ट्राएज पर आवाज नहीं” का अर्थ अकेले यह नहीं कि कैच हर स्थिति में अमान्य या वैध है। क्रिकेट में कैच और स्टंपिंग के नियम इसी अंतर को उदाहरणों से समझाता है।
अगर फैसला एल्बीडब्ल्यू हो: हॉक-आई क्या दिखाता है?
एल्बीडब्ल्यू रिव्यू में तीसरा अंपायर गेंद के पिचिंग स्थान, पैड से टकराने के बिंदु और विकेट तक संभावित रास्ते की जांच करता है। हॉक-आई इन दृश्यों को गेंद की गति और दिशा के मॉडल से जोड़ता है, लेकिन यदि अनुमानित संपर्क या विकेट क्षेत्र अंपायर्स कॉल की सीमा में हो, तो मैदानी अंपायर का मूल निर्णय कायम रहता है। यही एल्बीडब्ल्यू डीआरएस का सबसे विवादित, पर सबसे नियमबद्ध हिस्सा है।
एल्बीडब्ल्यू समीक्षा को एक क्रम में पढ़ें:
- पिचिंग: गेंद विकेट के सामने या बाहर कहां टप्पा खाई?
- प्रभाव: गेंद पैड से विकेट की लाइन के भीतर कहां टकराई?
- विकेट: अनुमानित रास्ते पर गेंद स्टंप्स से टकराती या नहीं?
- मूल निर्णय: अंपायर ने पहले आउट या नॉट आउट क्या दिया था?
अंपायर्स कॉल का गणित समझना जरूरी है। यदि गेंद का अनुमानित रास्ता स्टंप के किनारे के बहुत पास है और तकनीकी सीमा निर्णायक रूप से पार नहीं होती, तो रिव्यू मूल निर्णय नहीं बदलता। यह तकनीक की विफलता नहीं, नियमों द्वारा अनिश्चितता को संभालने का तरीका है। ईएसपीएनक्रिकइन्फो के डीआरएस विश्लेषण में भी एल्बीडब्ल्यू के दौरान पिचिंग, प्रभाव और विकेट के अलग-अलग चरण दिखाए जाते हैं।
एक contrarian लेकिन उपयोगी निष्कर्ष यह है कि एल्बीडब्ल्यू में “सही दिखने वाला” रिव्यू हमेशा अच्छा रिव्यू नहीं होता। अगर मूल निर्णय नॉट आउट है और गेंद केवल स्टंप के किनारे को छूती दिखती है, तो रिव्यू बच सकता है, मगर विकेट मिलने की वास्तविक संभावना कम रहती है। अपेक्षित लाभ यानी संभावित विकेट और रिव्यू-हानि की तुलना करना भावनात्मक अपील से बेहतर है। मानो या न मानो—मैं ऐसा ही मानता हूं।

डीआरएस की आम गलतियां कौन-सी हैं?
डीआरएस में सबसे आम गलती यह मानना है कि हर रिव्यू का उद्देश्य अंपायर को गलत साबित करना है। असल में रिव्यू सीमित संसाधन है, इसलिए कप्तान को उपलब्ध संकेतों की विश्वसनीयता, मैच की स्थिति और संभावित लाभ को एक साथ देखना चाहिए। तेज अपील, दर्शकों का शोर या बल्लेबाज की नाराजगी प्रमाण नहीं बनते; गेंद और नियम ही निर्णय का आधार हैं।
इन गलतियों से बचना चाहिए:
- 15 सेकंड खत्म होने के बाद संकेत देने की कोशिश करना।
- विकेटकीपर की पहली प्रतिक्रिया को अंतिम प्रमाण समझना।
- अल्ट्राएज में आवाज का समय देखे बिना केवल ध्वनि पर भरोसा करना।
- एल्बीडब्ल्यू में पिचिंग और प्रभाव की शर्तें भूल जाना।
- अंपायर्स कॉल को “तकनीकी गलती” समझना।
- पहले से खर्च हो चुके रिव्यू की संख्या न गिनना।
- नो-बॉल, वाइड या शॉर्ट-रन जैसी घटनाओं को समीक्षा योग्य मान लेना, जबकि नियम अलग हो सकते हैं।
2026 में दर्शकों के लिए एक व्यावहारिक जांच यह है कि प्रसारण में दिखने वाले “निर्णय समीक्षा” चरणों को अलग-अलग पढ़ें। पहले स्निकोमीटर या अल्ट्राएज, फिर फ्रंट-फुट नो-बॉल जांच, और उसके बाद गेंद की दिशा दिखाई जा सकती है। हर मैच में उपलब्ध कैमरा और तकनीक समान नहीं होती; हॉट स्पॉट कई प्रसारणों में उपलब्ध नहीं रहता, जबकि अल्ट्राएज और हॉक-आई का संयोजन अधिक सामान्य है। इस अंतर को समझे बिना भारत बनाम इंग्लैंड या पाकिस्तान बनाम ऑस्ट्रेलिया मुकाबलों की तुलना करना सांख्यिकीय रूप से कमजोर होगा।
क्या डीआरएस के प्रत्येक चरण को एक जगह संक्षेप में देखना चाहते हैं? यह उपयोगी संदर्भ खोलें।
क्या 30 दिनों में डीआरएस नियम बदल सकते हैं?
डीआरएस के मूल सिद्धांत सामान्यतः स्थिर रहते हैं, लेकिन प्रतियोगिता की खेल शर्तें, उपलब्ध तकनीक और रिव्यू की संख्या आयोजक या आईसीसी के निर्देशों से बदल सकती है। इसलिए 30 दिन पहले पढ़ा गया नियम किसी विशेष श्रृंखला, घरेलू टूर्नामेंट या महिला क्रिकेट मुकाबले में अलग लागू हो सकता है। आधिकारिक खेल शर्तों की तारीख और प्रतियोगिता का प्रारूप जांचना सबसे सुरक्षित तरीका है।
इस 30-दिन के पुनरावलोकन को व्यावहारिक जांचसूची की तरह इस्तेमाल करें:
- प्रतियोगिता टेस्ट, एकदिवसीय, टी20 या घरेलू प्रारूप है?
- प्रत्येक पारी में कितने असफल रिव्यू मिलते हैं?
- अंपायर्स कॉल पर रिव्यू बचता है या नहीं?
- फ्रंट-फुट नो-बॉल जांच डीआरएस में शामिल है?
- हॉट स्पॉट, अल्ट्राएज और हॉक-आई में कौन-सी तकनीक उपलब्ध है?
- बारिश, रोशनी या उपकरण विफलता की स्थिति में वैकल्पिक प्रक्रिया क्या है?
आईसीसी की खेल शर्तें समय-समय पर अद्यतन होती हैं, जबकि मैरीलेबोन क्रिकेट क्लब कानूनों की व्याख्या अलग स्तर पर काम करती है। उदाहरण के लिए, नियमों का मूल अर्थ वही रह सकता है, पर किसी श्रृंखला में टीम को दो के बजाय एक असफल रिव्यू मिल सकता है। आधिकारिक दस्तावेज में “तकनीक का उपयोग उपलब्धता के अधीन है” जैसी शर्त का व्यावहारिक मतलब यही है कि प्रसारण स्क्रीन पर दिखने वाला हर उपकरण हर मैदान में अनिवार्य नहीं है।
आईसीसी की भावना को संक्षेप में इस तरह समझा जा सकता है: “तकनीक का उद्देश्य स्पष्ट त्रुटियों को सुधारना है, हर निर्णय को पूर्ण गणितीय निश्चितता में बदलना नहीं।” यह विचार अंपायर्स कॉल के अस्तित्व को समझाता है। क्रिकेट अंपायरिंग संकेतों और नियमों की शब्दावली पढ़ने पर आप रिव्यू के साथ नो-बॉल, डेड बॉल और सॉफ्ट सिग्नल जैसे शब्द भी समझ सकेंगे।
डीआरएस तकनीकों की तुलना कैसे करें?
हॉक-आई, अल्ट्राएज और हॉट स्पॉट तीन अलग सवालों के उत्तर देते हैं; इन्हें एक-दूसरे का पूर्ण विकल्प समझना गलत है। हॉक-आई गेंद के मार्ग और संभावित प्रभाव पर केंद्रित है, अल्ट्राएज बल्ले या पैड से संपर्क के समय ध्वनि संकेत खोजता है, जबकि हॉट स्पॉट टकराव से उत्पन्न तापीय निशान दिखाने की कोशिश करता है। इसलिए सही तकनीक घटना के प्रकार पर निर्भर करती है, न कि केवल स्क्रीन पर दिखने वाली चमकदार रेखा पर।
| तकनीक | मुख्य उपयोग | प्रमुख सीमा |
|---|---|---|
| हॉक-आई बॉल ट्रैकिंग | एल्बीडब्ल्यू और गेंद का मार्ग | अनुमानित प्रक्षेपण पर निर्भरता |
| अल्ट्राएज | बल्ले से किनारा लगना | समय-संबंधी ध्वनि की व्याख्या |
| हॉट स्पॉट | संपर्क का तापीय निशान | उपलब्धता और दृश्य स्पष्टता |
| वीडियो रिप्ले | कैच, स्टंपिंग, रन-आउट | कैमरा कोण और फ्रेम दर |
इस तुलना से एक दूसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है: डीआरएस का निर्णय किसी एक मशीन की राय नहीं, प्रमाणों की श्रृंखला है। रन-आउट में क्रीज और बल्ले की स्थिति, स्टंपिंग में गेंद और दस्ताने का संबंध, तथा कैच में नियंत्रण और जमीन का संपर्क अलग-अलग जांचे जा सकते हैं। 2026 के उच्च-स्तरीय प्रसारण में कई कोण होने के बावजूद छिपा हुआ संपर्क हमेशा स्पष्ट नहीं होता, इसलिए तीसरे अंपायर को उपलब्ध सर्वोत्तम दृश्य के आधार पर निर्णय देना पड़ता है।
मैदान पर कप्तान के लिए अपेक्षित मूल्य का सरल सूत्र है: संभावित विकेट का लाभ, रिव्यू खोने की लागत से बड़ा हो तो चुनौती उचित हो सकती है। टेस्ट की 90 ओवर वाली लंबी पारी और टी20 की 20 ओवर वाली पारी में यही गणना अलग परिणाम देगी। टी20 और टेस्ट क्रिकेट की रणनीतिक तुलना इस फर्क को संदर्भ सहित समझाता है।

अब निष्कर्ष सीधा है: डीआरएस अंपायर का प्रतिस्थापन नहीं, अनिश्चित घटनाओं पर नियंत्रित प्रमाण-प्रणाली है। 15 सेकंड की सीमा, सीमित रिव्यू, तीन एल्बीडब्ल्यू परीक्षण और अंपायर्स कॉल इसके चार सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। आईपीएल समाचार पर क्रिकेट रणनीति, खिलाड़ी आंकड़ों और मैच समीक्षा को समझते समय डीआरएस के इन नियमों को साथ रखें, क्योंकि एक रिव्यू का मूल्य स्कोरकार्ड में दर्ज विकेट से कहीं अधिक हो सकता है। सही प्रश्न “क्या तकनीक ने फैसला बदला?” नहीं, बल्कि “क्या उपलब्ध प्रमाण मूल फैसले को निर्णायक रूप से बदलते हैं?” होना चाहिए।
यदि आप मैच देखते समय इन संकेतों को तुरंत पहचानना चाहते हैं, तो आगे की क्रिकेट सामग्री से शुरुआत करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: क्रिकेट में डीआरएस क्या है?
उत्तर: डीआरएस वह तकनीक-आधारित प्रक्रिया है जिसमें टीम मैदानी अंपायर के निर्णय की समीक्षा मांग सकती है। तीसरा अंपायर वीडियो रिप्ले, हॉक-आई, अल्ट्राएज और उपलब्ध अन्य प्रमाणों का उपयोग करता है। रिव्यू सामान्यतः 15 सेकंड के भीतर लेना होता है और इसकी संख्या मैच प्रारूप के अनुसार सीमित रहती है। एल्बीडब्ल्यू में पिचिंग, प्रभाव और विकेट तीन मुख्य चरण हैं।
प्रश्न: डीआरएस कैसे लिया जाता है?
उत्तर: कप्तान या मैदान पर मौजूद बल्लेबाज 15 सेकंड के भीतर दोनों हाथों से “टी” संकेत देकर रिव्यू मांगता है। मैदानी अंपायर अनुरोध की पुष्टि करता है और मामला तीसरे अंपायर को भेजा जाता है। तीसरा अंपायर पहले तकनीकी प्रमाण देखता है, फिर निर्णय बदलने, बरकरार रखने या अंपायर्स कॉल लागू करने की सूचना देता है।
प्रश्न: हॉक-आई और अल्ट्राएज में क्या अंतर है?
उत्तर: हॉक-आई गेंद का मार्ग और एल्बीडब्ल्यू में संभावित विकेट-टकराव दिखाता है, जबकि अल्ट्राएज बल्ले या पैड से संपर्क के समय ध्वनि संकेत खोजता है। हॉक-आई ज्यामितीय प्रक्षेपण पर निर्भर है और अल्ट्राएज में आवाज का सही समय महत्वपूर्ण होता है। इसलिए एल्बीडब्ल्यू और कैच रिव्यू में दोनों तकनीकें अलग-अलग प्रश्नों का उत्तर देती हैं।
प्रश्न: अंपायर्स कॉल में रिव्यू क्यों नहीं बदलता?
उत्तर: अंपायर्स कॉल तब लागू होती है जब बॉल ट्रैकिंग परिणाम निर्णायक सीमा के बहुत करीब हो और मूल अंपायर का फैसला नियम के अनुसार कायम रखा जाए। यह तकनीकी असफलता नहीं, अनिश्चितता संभालने वाला नियम है। सामान्यतः ऐसी स्थिति में टीम का रिव्यू भी बचा रहता है, हालांकि अंतिम व्यवस्था प्रतियोगिता की खेल शर्तों पर निर्भर करती है।
प्रश्न: डीआरएस में कितने रिव्यू मिलते हैं?
उत्तर: रिव्यू की संख्या प्रारूप और प्रतियोगिता की खेल शर्तों पर निर्भर करती है; अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में टेस्ट और एकदिवसीय मैचों में सामान्यतः दो असफल रिव्यू प्रति पारी, जबकि टी20 अंतरराष्ट्रीय में एक असफल रिव्यू मिलता है। सफल चुनौती और अंपायर्स कॉल पर रिव्यू सामान्यतः वापस रहता है। किसी खास 2026 श्रृंखला के लिए आईसीसी का आधिकारिक दस्तावेज जांचना चाहिए।
प्रश्न: डीआरएस काम न करे तो क्या होता है?
उत्तर: तकनीकी उपकरण या संचार प्रणाली विफल होने पर तीसरा अंपायर उपलब्ध प्रमाण के आधार पर समीक्षा करता है और जरूरत पड़ने पर मैदानी अंपायर का मूल निर्णय बरकरार रहता है। हर मैदान पर हॉट स्पॉट या सभी कैमरा कोण उपलब्ध नहीं होते। इसलिए तकनीकी उपलब्धता, रोशनी, बारिश और प्रसारण व्यवस्था के अनुसार प्रक्रिया बदल सकती है।
प्रश्न: क्या डीआरएस का उपयोग मुफ्त और अनिवार्य है?
उत्तर: दर्शकों के लिए डीआरएस देखने की कोई अलग शुल्क-व्यवस्था नहीं होती, लेकिन मैच आयोजक इसके तकनीकी संचालन का खर्च वहन करते हैं और हर प्रतियोगिता में इसका उपयोग अनिवार्य नहीं होता। आईसीसी मुकाबलों में खेल शर्तें बताती हैं कि कौन-सी तकनीक और कितने रिव्यू उपलब्ध होंगे। घरेलू प्रतियोगिताओं में व्यवस्था बोर्ड, मैदान और प्रसारण साझेदार के अनुसार बदल सकती है।